यह जो होता है...।
हम दूसरों के लिए अपने हिसाब से बहुत अच्छा करने की ज़द्दोज़हद में रहते हैं। यह कश्मकश तब तक रहती है जब तक कि हमें यह न लग जाए कि हमने अपना अंतिम प्रयास कर लिया है।यह हमारे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा होता है।हम निभाना जानते हैं,निभाना चाहते हैं। कुल जमा यह सब करने के बाद हम सोचते हैं कि हमारे किए धरे के लिए हम 'एप्रिशिएट' किये जाएंगे। यह बहुत कम होता है। लोग अपनी दुनिया के हिसाब से एक लकीर बनाते हैं। अगर इस लकीर के भीतर आपके अच्छे काम शामिल होते हैं तो लोग एक नज़र आपकी ओर देखते हैं नहीं तो सबकुछ किया हुआ किनारे कर दिया जाता है। हम जूझते रह जाते हैं कि हमने कमी कहाँ कर दी,और जवाब नहीं मिलता। मिलेगा भी नहीं, क्योंकि सवाल यह भी तो बन सकता है कि ' किसने कहा है अच्छा करने को?' बस यहीं से हम बहुत पीछे हो जाते हैं।
हम कभी अच्छे नहीं बन पाते क्योंकि हम ख़ुद पर विश्वास नहीं कर रहे होते हैं और दूसरे की छोटी से छोटी खशियों में अपना मन जला रहे होते हैं।हम जोह रहे होते हैं कि हमें अच्छा कहा जाय! हम जो भी कर रहे हैं ,उसे 'बढ़िया' कह दिया जाय। यह सब जब नहीं होता तब हमें लगता है कि दुनिया वैसी नहीं है जैसी हमने सोच ली है। सच तक आते- आते हम अपने को बहुत खो देते हैं।
जीने का तरीका यही है कि बस उनका ख़्याल रखिये जो आपका ख़्याल रखते हैं। इस उधेड़बुन में जिनको आप तवज़्ज़ो नहीं दे पाते है,वे आपके लिए हरदम मौजूद होते हैं। जिनको हमने तवज़्ज़ो दी,वह अपनी लकीर बचाने की फ़िक्र में जीये जाते हैं। खुशियों की कीमत नहीं हो सकती है लेकिन उन भावनाओं की कीमत और कदर दोनो होती है जब आप किसी का केवल अच्छा सोच रहे होते हैं। अच्छा सोचिए,बस उनका सोचिए जो आपका अच्छा सोचते हैं।
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