कड़वी जिंदगी।

आती- जाती खुशियाँ हमारे जीवन की सबसे अबूझ पहेली हैं।हमें अपने दुःख में दूसरे का मुस्कुराता चेहरा भी बुरा लगता है और अपने सुख में हमें सभी सुखी दिखाई देने लगते हैं।खशियों को पहचानने के बाद जब एक उम्र की दहलीज आती है तब पता चलता है कि यह सब भरम था। जो खुशी थी,वह मरीचिका थी,एक आभास रूपी छाया मात्र थी। जो बहुत अच्छा दिखाई देता है,वह बुरा मालूम होने लगता है। जिन्हें हम बहुत अच्छा नहीं मानते वह लोग हमारे बुरे वक्त में हमे सहारा देने को खड़े मिलते हैं। यह एहसास इतना मजबूत होता है कि हम बहुत कुछ सोचने पर विवश हो जाते हैं।हम सोचते हैं कि हमारा नुकसान जहाँ था हमने वहाँ उम्र गुज़र कर ली, जबकि जहाँ सुंदर से रोशनी आ सकती थी,वे खिड़कियाँ ही बन्द कर दी।

   बहुत विनम्र होना हमे बेवकूफ बनाता है। बहुत 'रिजिड' होना  भी आपको सम्मान नहीं दिला सकता है। बीच का रास्ता यही है कि आपका ख्याल रखने वालों का ख्याल रखिये और नफ़रत मिज़ाज़ वाले लोगों से दूरी बनाइये। जहाँ तक हो सके,खुद को बचाना पड़ेगा। मुस्कुराइए,सारी समस्याओं का हल ख़ुद बा ख़ुद सामने होगा।

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