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यह जो होता है...।

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हम  दूसरों के लिए अपने हिसाब से बहुत अच्छा करने की ज़द्दोज़हद में रहते हैं। यह कश्मकश तब तक रहती है जब तक कि हमें यह न लग जाए कि हमने अपना अंतिम प्रयास कर लिया है।यह हमारे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा होता है।हम निभाना जानते हैं,निभाना चाहते हैं। कुल जमा यह सब करने के बाद हम सोचते हैं कि हमारे किए धरे के लिए हम 'एप्रिशिएट' किये जाएंगे। यह बहुत कम होता है। लोग अपनी दुनिया के हिसाब से एक लकीर बनाते हैं। अगर इस लकीर के भीतर आपके अच्छे काम शामिल होते हैं तो लोग एक नज़र आपकी ओर देखते हैं नहीं तो सबकुछ किया हुआ किनारे कर दिया जाता है। हम जूझते रह जाते हैं कि हमने कमी कहाँ कर दी,और जवाब नहीं मिलता। मिलेगा भी नहीं, क्योंकि सवाल यह भी तो बन सकता है कि ' किसने कहा है अच्छा करने को?' बस यहीं से हम बहुत पीछे हो जाते हैं।                      हम कभी अच्छे नहीं बन पाते क्योंकि हम ख़ुद पर विश्वास नहीं कर रहे होते हैं और दूसरे की छोटी से छोटी खशियों में अपना मन जला रहे होते हैं।हम जोह रहे होते हैं कि हमें अच्छा कहा जाय! हम जो भी कर रहे हैं ,उसे 'बढ़िय...

कड़वी जिंदगी।

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आती- जाती खुशियाँ हमारे जीवन की सबसे अबूझ पहेली हैं।हमें अपने दुःख में दूसरे का मुस्कुराता चेहरा भी बुरा लगता है और अपने सुख में हमें सभी सुखी दिखाई देने लगते हैं।खशियों को पहचानने के बाद जब एक उम्र की दहलीज आती है तब पता चलता है कि यह सब भरम था। जो खुशी थी,वह मरीचिका थी,एक आभास रूपी छाया मात्र थी। जो बहुत अच्छा दिखाई देता है,वह बुरा मालूम होने लगता है। जिन्हें हम बहुत अच्छा नहीं मानते वह लोग हमारे बुरे वक्त में हमे सहारा देने को खड़े मिलते हैं। यह एहसास इतना मजबूत होता है कि हम बहुत कुछ सोचने पर विवश हो जाते हैं।हम सोचते हैं कि हमारा नुकसान जहाँ था हमने वहाँ उम्र गुज़र कर ली, जबकि जहाँ सुंदर से रोशनी आ सकती थी,वे खिड़कियाँ ही बन्द कर दी।    बहुत विनम्र होना हमे बेवकूफ बनाता है। बहुत 'रिजिड' होना  भी आपको सम्मान नहीं दिला सकता है। बीच का रास्ता यही है कि आपका ख्याल रखने वालों का ख्याल रखिये और नफ़रत मिज़ाज़ वाले लोगों से दूरी बनाइये। जहाँ तक हो सके,खुद को बचाना पड़ेगा। मुस्कुराइए,सारी समस्याओं का हल ख़ुद बा ख़ुद सामने होगा।